| ۱- |
ای که یک عمر مانده ای در خواب |
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چشم بُگشا و مانده را دریاب |
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| ۲- |
به خرابات دید هشیاری |
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هر که آباد بود، مَست و خراب |
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| ۳- |
با طمأنینه و صدای بلند |
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گفت ای لوطیان فرصت یاب |
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| ۴- |
باختن عُمر، بهرِ باده چه سود |
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خود چه بُردید بهره از مِی ناب؟ |
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| ۵- |
یک صدا گشته جملگی، گفتند: |
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بازکُن چشم و بازگیر حجاب |
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| ۶- |
تا ببینی که عقلِ اوهامی |
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این شنا نابَلَد، در این مُرداب: |
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| ۷- |
ادّعا می کند نجات دهد |
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هر غریقی که غَرق گشته در آب |
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| ۸- |
گو، چه داند ز غرق و کیست غریق |
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سود چِبوَد، زیان چه، چیست جواب؟ |
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| ۹- |
دَر پیِ این سخن «جلالی» گفت |
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این سخن دَر قِبالِ صرفِ شراب: |
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| ۱۰- |
عقل و جَهلند مِصرَعِ یک بیت |
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هر دو یک لنگه اَند، از یک باب |
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