| ۱- |
اِی بَندیِ دلبند، که داده ست عذابت |
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دَر بند، چسان می گذرد دورِ شَبابت |
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| ۲- |
آوار شود بَر سرِ او خانه اش از جور |
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آنگونه که کردست چنین خانه خرابت |
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| ۳- |
بَرگو، به من ای بلبلِ گویا به چه جُرمی |
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هم باز گرفتندت و هم دانه و آبت |
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| ۴- |
امّید که هرگز نرسد خواب به چشمش |
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آن کس که گرفته ست زِ تو خوردَن و خوابت |
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| ۵- |
هر بار که از مادرِ پیرِ تو کنم یاد |
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سوزد دلم از بهرِ تو و مامت و بابت |
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| ۶- |
تو نوگلِ بُستان و چمن بودی و چیدند |
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از شاخه و بُردند و گرفتند گلابت |
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| ۷- |
با تیرِ ستم زخمی و بر آتشِ بیداد |
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ای طایرِ قُدسی، زِ چه کردند کبابت |
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| ۸- |
ای کاش شود کور، وِرا چشم و نبیند |
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آن ظالم گیرنده ات اندر تب و تابت |
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| ۹- |
بستند اگر بر تو ره، آن راهزنان باز |
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یارانِ تو پویند ره و رسمِ صوابت |
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| ۱۰- |
هُشدار «جلالی» که حسابی و کتابیست |
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در آخر و هر چند که پاک است حسابت |
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