| ۱- |
کور از دو دیده را، به تماشا چه حاجتَست |
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معشوقهِ پری وشِ زیبا چه حاجتست |
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| ۲- |
آن دیده را که روز و شبَش بی تفاوتست |
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دیدارِ چشمِ نرگِس شهلا چه حاجتست |
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| ۳- |
لحن و بیانِ نرم به گوشش بُوَد ضرور |
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او را دِگر مخاطبِ گیرا چه حاجتست |
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| ۴- |
ای پادشاهِ حُسن، کریمانه فیض بخش |
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دانی! دگر مپرس گدا را چه حاجتست |
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| ۵- |
من بنده ی صدیّقم و بر تُست آشکار |
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اِظهارِ فضل در بَرِ دانا چه حاجتست |
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| ۶- |
ما را به آرزویِ دلِ خویشتن رسان |
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با بوسه ای، تو را به تمنّا چه حاجتست |
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| ۷- |
مُشتاقِ خود هر آینه بسیار دیده ای |
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ما هَم یکی، مپرس که ما را چه حاجتست |
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| ۸- |
با دشمنان ملایمی، این هم ز حُسنِ تست |
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با دوستان مگو که مدارا چه حاجتست |
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| ۹- |
من ماهیم، تو ماهی و دریادلی، مرا |
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دریا غَنیمتَست، به صحرا چه حاجتست |
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| ۱۰- |
در خَلوَتَش «جلالی» از او دست برمدار |
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«خلوت گزیده را به تماشا چه حاجتست |
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