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آ |
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آبْ چَلَقّون |
[ab-tʃɛlæqquN] |
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[پ ۱: ۴۴۵] |
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آب چکان [پ ۱: ۴۴۶]/ آبکی، نرم و بی رمق، غذا یا چیزی که بیش از اندازه آبکی باشد [گویش: ۱]. |
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آبْ لَمْبون |
[ab-læmbuN] |
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[پ ۲: ۲۳۸] |
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آب لنبه کردن: فشردن میوه ای چون انار و جدا کردن آب آن از دانه در پوست خود [دهخدا ۱: ۲۸]/ انار، لیمو و یا دیگر میوه ها را فشرده و برای راحتی سوراخ کرده و با فشار آب خارج شده از آن را میمکند، به این عمل آب لَمبون (اُوتُلُک) می گویند [م.ت]. |
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آتیش |
[atiʃ] |
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[پ ۲: ۲۳۳] |
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آتش [یزدی: ۴]. |
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آتیش بِه جون |
[atiʃ-be-dʒuN] |
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[پ ۲: ۲۳۳] |
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فحش و ناسزایی که معمولاً مادران به بچه های کوچک می دهند [یزدی: ۲]/ آتش به جان: غم و سوزش و شوق محبت و آتش به جان گرفته، نفرینی است [دهخدا ۱: ۳۴]. |
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آجین |
[adʒiN] |
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[پ ۱: ۴۴۱] |
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پیاپی، مکرر، پشت سر هم [م.ت]. |
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آخِرِ سَر |
[axeresær] |
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[پ ۳: ۲۱۳] |
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سرانجام، در پایان، در آخر [م.ت]. |
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آخِر و پایون |
[axer-o-pajuN] |
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[پ ۴: ۱۲۴] |
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سرانجام، آخر و پایان [م.ت]. |
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آخِش |
[axeʃ] |
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[پ ۴: ۱۳۰] |
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از اصوات و حکایت از درد یا خوشی کند [دهخدا ۱: ۴۲]/ سخنی که در زمان راحتی و آسودگی گفته می شود، (آخِیش) [م.ت]. |
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آخون |
[axuN] |
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[پ ۳: ۲۲۵] |
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آخوند: (شاید مخفّفی از آن و خوندگار به معنی خداوندگار)، ملّا، مثلاً: عالم و یا طالب علوم دینی، مکتب دار کودکان، معلّم کتاب [دهخدا ۱: ۴۳]/ روحانی [م.ت]. |
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آدُر |
[a:dor] |
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[پ ۲: ۲۴۶] |
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یک نوع بوتۀ خار بیابانی است که بیشتر در بیابانهای داغ، خشک و شنی می روید. خیلی کم برگ بوده و بوته را خارهای بلند با ساقه های باریک زرد و نیمه خشک تشکیل می دهند، در بیشه، خوراک شتر است [گویش: ۴]/ گیاه خارشتر [ح.م]. |
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آدَمیزادا |
[adæmizada] |
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[پ ۳: ۲۱۷] |
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آدمی زادها [م.ت]. |
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آراش |
[araʃ] |
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[پ ۱: ۴۲۰] |
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آرایش [یزدی: ۳]. |
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آرْت |
[art] |
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[پ ۴: ۱۱۹] |
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آرد [گویش: ۵]. |
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آرْز |
[arz] |
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[پ ۱: ۴۱۱] |
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آرزو [یزدی: ۴]. |
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آرزِ دِلِ [-] بودَن |
[arz-e-del-e-[-]-budæN] |
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[پ ۱: ۴۱۱] |
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آرز دل بودن: منتهای آرزو، آرزویی دور و دراز، آرزویی فوق العاده [گویش: ۵]/ آرزو داشتن، از خدا خواستن [م.ت]. |
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آرز و هَوَس |
[arz-o-hævæs] |
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[پ ۲: ۲۴۴] |
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امید و آرزو، آمال [م.ت]. |
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آسمون غُرُمبِش |
[asemun-ɤorombeʃ] |
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[پ ۴: ۱۲۵] |
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غرنبیدن [یزدی: ۵]/ آسمون غرنبه: تندر، رعد [دهخدا ۱:۹۶]/ صدای بلند ناشی از آذرخش [م.ت]. |
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آس و پاس |
[as-o-pas] |
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[پ ۱: ۴۲۲] |
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لات، آسمان جل [پ ۱: ۴۴۶/ یزدی: ۵]/ فقیر و بی چیز، ندار [گویش: ۵]. |
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آسَّه |
[assɛ] |
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[پ ۴: ۱۲۵] |
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آهسته [یزدی: ۴/ گویش: ۵]/ آرام، بی سر و صدا [م.ت]. |
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آسَّه پِتُک |
[assɛpetok] |
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[پ ۴: ۱۲۵] |
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آهسته و بدون سر و صدا حرف زدن و یا پاورچین پاورچین راه رفتن [گویش: ۵]/ به آهستگی، به آرامی، درگوشی سخن گفتن [م.ت]. |
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آشقال |
[aʃqal] |
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[پ ۳: ۲۱۷] |
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آشغال، زباله، دور ریختنی [م.ت]. |
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آکی |
[aki] |
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[پ ۱: ۴۱۷] |
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آی فلانی [پ ۱: ۴۴۶]/ واژه ای است که هنگام صدا زدن فردی که نامش را نمی دانیم، به کار برده می شود/ با تمسخر به فردی می گویند که تصور می کند خیلی مهم شده و خودش را می گیرد [گویش: ۷]/ آی فلانی، کنایه از کسی که تازه به نوایی رسیده، نوکیسه [یزدی: ۷]. |
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آکیُک |
[akijok] [a:kijok] |
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[پ ۱: ۴۱۷] |
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ای فلانک [پ ۱: ۴۴۶/ یزدی: ۷]/ مصغّر کلمۀ آکی (بیشتر خطاب به کودکان گفته می شود) [گویش: ۵]/ آهای یارو [م.ت]. |
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آواجی |
[avadʒi] |
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[پ ۳: ۳۰۹] |
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آبجی: (از آن، به ترکی به معنی سیّد و سیّده و باجی به ترکی به معنی خواهر)، در تداول خانگی، خواهر [دهخدا ۱: ۱۷]/ آباجی [یزدی: ۱۰]. |
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آوازِ چارْگاه |
[avaz-e-tʃarga] |
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[پ ۳: ۲۲۴] |
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آواز چهارگاه، دستگاه موسیقی [ح.م]. |
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آیِ |
[a:je] |
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[پ ۳: ۲۱۷] |
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آقای [م.ت]. |
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آیِ دوکوندار |
[a:je-dukuNdar] |
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[پ ۳: ۲۱۷] |
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آقای دکّان دار، آقای مغازه دار [م.ت]. |
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آینَه بَندون کِردَن |
[ajnɛ:-bænduN-kerdæN] |
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[پ ۲: ۲۳۵] |
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عمل تزیین خانه و کوی با نهادن آیینۀ بسیار بر دیوارها و جز آن [دهخدا ۱: ۲۰۴]/ آذین بندی کردن، آیینه بندان کردن [م.ت]. |
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