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س |
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ساآر |
[sahar] [sa:r] |
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[پ ۱: ۴۱۳] |
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به معنی مزه ناخوشایند و دل به هم زن به کار می رود، گاهی نیز در مورد اشخاصی که طرز رفتار و یا طرز بیانی خنک و نچسب دارند، به کار می رود [گویش: ۱۱۰]/ بی مزّه، در مورد اغذیه مثل: گوشت تازه یا آبگوشت و غذایی که هنوز ناپخته است، گفته می شود [یزدی: ۱۵۸]. |
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ساباتْ |
[sabat] |
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[پ ۴: ۱۲۵] |
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ساباط: کوچۀ سقف دار در یزد و برخی از شهرهای قدیمی بخصوص در اطراف کویر برای اینکه عابرین تا حدّی از گرما در فصول گرم مصون بمانند، در روی برخی از کوچه ها سقف ضربی میزدند. وجود این سقف ها موجب استحکام دیوارهای دو طرف نیز می شد [گویش: ۱۱۰]/ سقفی که بر فراز کوچه ها به شکل ضربی می زنند از برای خنثی کردن فشار وارده بر دیوارهای دو سوی کوچه و به منظور ایجاد سایبان و گریز از آفتاب. [یزدی: ۱۵۸]/ ساباط: پوشش رهگذر، بالایی که در زیر آن راه بود، پوشش و سقف، سقف بازار، سقف میان دو دیوار که زیر آن راه است [دهخدا ۸: ۱۱۶۱۷]. |
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سات |
[sa:t] |
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[پ ۴: ۱۲۳] |
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ساعت، زمان [م.ت]. |
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سَبَدْ سَر |
[sEbæd-sær] |
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[پ ۱: ۴۲۸] |
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سبد به سر، در قدیم افراد فروشنده ماسوره و وسایل ریسندگی سبد لوازم خود را بر روی سر می گذاشتند [م.ت]. |
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سُخَنْ رون |
[soxæN-ruN] |
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[پ ۳: ۲۲۴] |
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سخنران، سخنور، گوینده [م.ت]. |
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سَرْ اومَدَن |
[sEr-umEdæN] |
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[پ ۴: ۱۲۳] |
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سر آمدن، به پایان آمدن [م.ت]. |
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سَرْ بُلَن |
[sær-bolæN] |
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[پ ۴: ۱۲۶] |
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سربلند [م.ت]. |
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سَرْتْ |
[sært] |
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[پ ۱: ۴۱۳] |
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سرد [یزدی: ۱۶۰/ گویش: ۱۱۲/ پ: ۴۵۵]/ بی هیجان، بی مزّه [م.ت]. |
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سَرْتُوْ خورْدَن |
[sær-tow-xordæN] |
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[پ ۲: ۲۴۶] |
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گیج رفتن سر [م.ت]. |
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سَرْ خورْدَن |
[sær-xordæN] |
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[پ ۲: ۲۳۹] |
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|
باعث مردن کسان خود شدن، شومی و باعث مرگ کسان نزدیک شدن [دهخدا ۸: ۱۱۹۷۳]/ سرخور بودن، بد یُمن و بد قدم بودن [م.ت]. |
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سَرْ راس |
[særras] |
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[پ ۴: ۱۱۸] |
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سر راست، مستقیم، ساده [م.ت]. |
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سَرْ رَسیدَن |
[sær-rEsidæN] |
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[پ ۴: ۱۳۰] |
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از راه رسیدن، باز آمدن [م.ت]. |
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سَرْ دادَن |
[sær-dadæN] |
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[پ: ۴۴۲] |
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ول دادن، رها کردن، اغلب برای آب به حوض انداختن و باد رها کردن به کار می رود. میگویند: «آب را سَر دِه بیاد» [یزدی: ۱۶۱]/ ول کردن، رها کردن، طناب را سر داد، صدا سر داد، آب را سر داد [گویش: ۱۱۲]/ بِلِه کردن، رها کردن، ول کردن [دهخدا ۸: ۱۱۹۷۷]. |
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سَر دَر اُردَن |
[sær-dErordæN] |
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[پ ۳: ۲۱۳] |
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|
پی بردن، متوجّه شدن، فهمیدن [م.ت]. |
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سَر دَم صِدا |
[sær-dæm-seda] |
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[پ ۳: ۲۱۰] |
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(ر ک به صدا سر دادن) فریاد زدن، صدا زدن [م.ت]. |
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سَرِ شُو |
[sEr-e-Sow] |
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|
[پ ۴: نسخة مجازی] |
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|
سر شب، نزدیکی های غروب [م.ت]. |
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سَرِ صابْ خورْدَن |
[sE:r-e-sa:b-xordæN] |
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|
[پ ۲: ۲۳۹] |
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|
برای صاحب خود بد یُمن است، به اعتقاد قدما، بعضی از اموال می توانست برای صاحب خود بد یُمن باشد [م.ت]. |
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سَرْقِیچی |
[særqejtSi] |
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[پ ۳: ۲۰۹] |
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|
پارچه های کوچک که در کار خیّاطی اضافه می ماند [م.ت]. |
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سَرُک |
[sErok] |
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[پ ۳: ۲۲۲] |
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|
(سر + ک تصغیر) نگاه دزدانه، سرک کشیدن [م.ت]. |
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سَرُک کَشیدَن |
[sErok-kESidæN] |
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|
[پ ۱: ۴۱۳] |
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|
دزدکی به جایی نگاه کردن، پنهانی از بالای دیوار یا از لای در نگریستن [گویش: ۱۲۲/ یزدی: ۱۶۱/ پ ۱: ۴۴۵]. |
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سَرْگَرْدون |
[særgærduN] |
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|
[پ ۲: ۲۳۷] |
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|
سرگردان، حیرت زده [م.ت]. |
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سَرِ گورِش |
[sEr-e-gureS] |
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[پ ۱: ۴۲۲] |
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|
(نفرین است) خبرِ مرگش را بیاورند، آرزوی مرگ کسی را کردن [م.ت]. |
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سَرُو |
[sErow] |
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|
[پ ۱: ۴۴۲] |
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|
مایع پر مزّه (سر + آب) [پ ۱: ۴۵۵/ یزدی: ۱۶۰]. |
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سَر و بالا |
[sEr-o-bala] |
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|
[پ ۳: ۲۴۱] |
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|
سر و ته، برعکس [م.ت]. |
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سَر و جون دادَن |
[sErudZum-dadæN] |
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[پ ۴: ۱۲۴] |
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|
سر و جون دادن: ملامت کردن و خفّت دادن کسی را، فداکاری کردن برای کسی [یزدی: ۱۶۲]/ سراجوم دادن: ملامت کردن، سرزنش کردن [گویش: ۱۱۲]/ با گوشه و کنایه با کسی سخن گفتن، منت گذاشتن [م.ت]. |
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|
سَر و زینَت |
[sær-o-zinæt] |
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|
[پ ۱: ۴۲۰] |
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|
زینت آلات [یزدی: ۱۶۲]/ زیور آلات [گویش: ۱۱۳]. |
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سَرِ وَعدَه |
[sEr-e-væ:dE] |
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|
[پ ۳: ۲۱۴] |
|
|
بر سر قرار قرار گذاشتن [م.ت]. |
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|
سَرِ وَعدَه [-] ا کاشتَن |
[sEr-e-væ:dE-[-]a-kaStæN] |
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|
[پ ۳: ۲۱۴] |
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|
با کسی قرار گذاشتن و نیامدن، منتظر گذاشتن [-] سر قرار [م.ت]. |
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سِرنا |
[se:rna] |
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|
[پ ۲: ۲۳۵] |
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|
نای رومی، سرنای، نایی که در مواقع سور و شادی نوازند [دهخدا ۸: ۱۲۰۱۲]/ نوعی ساز بادی، سُرنا [م.ت]. |
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|
سَرِ [-] نَدادَن |
[sEr-e-[-]-nEdadæN] |
|
|
|
[پ ۱: ۴۱۵] |
|
|
سَرُم نَمِدَن: من را رها نمی کنند [یزدی: ۱۶۲]/ (ر.ک به سر دادن) رها نکردن، ول نکردن [گویش: ۱۱۳]/ رها نکردن، سَرُم نَدادَن: مرا رها نمی کنند [پ ۱: ۴۵۵]/ کسی را رها نکردن، مراقبت شدید داشتن [م.ت]. |
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|
سَرِ هَم کِرْدَن |
[sEr-e-hæm-kerdæN] |
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|
[پ ۴: ۱۲۵] |
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|
ساختن، جفت و جور کردن [م.ت]. |
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سِغِشْتْ |
[seFeSt] |
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|
[پ ۱: ۴۳۶] |
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|
شن، ماسه، سنگریزه [پ ۱: ۴۵۵]/ مجازاً در مورد هر چیز سخت گفته می شود [یزدی: ۱۶۲]/ خورده سنگ و هر چیزی که سفت و ریز باشد [گویش: ۱۱۳]. |
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سِفْ |
[sef] |
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|
[پ ۱: ۴۱۰] |
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|
سفت، محکم، استوار [یزدی: ۱۶۲]. |
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سَگْ دُوی |
[sæg-doji] |
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|
[پ ۲: ۲۳۹] |
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|
تکاپو و جستن بی فایده، دوندگی بی فایده و بی ثمر [دهخدا ۸: ۱۲۰۸۱]. |
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سِلْ |
[sel] |
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|
[پ ۴: نسخه مجازی] |
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سنگریزه صاف و صیقلی [یزدی: ۱۶۴]/ اغلب به آن نوع از سنگ هایی که در ته رودخانه یافت می شود و صاف و سنگین است، اطلاق می شود [گویش: ۱۱۴]/ قلوه سنگ هایی سیاه رنگ که پله ها و کف کوچه را با آن سنگ فرش می کردند [م.ت]. |
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سُلْفَه |
[solfE] |
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|
|
[پ ۳: ۲۲۴] |
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|
سرفه [م.ت]. |
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سَلَنْدَر |
[sElændær] |
|
|
|
[پ ۱: ۴۱۲] |
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|
سرگردان [پ ۱: ۴۵۶/ یزدی: ۱۶۴]/ حیران و سرگردان [گویش: ۱۱۵]/ متحیّر، ویلان، فردی که نداند تکلیفش چیست، سخت سرگشته [دهخدا ۸: ۱۲۱۱۰]/ پا در هوا، بلا تکلیف [م.ت]. |
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|
سِنْ |
[seN] |
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|
|
[پ ۲: ۲۳۵] |
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|
سن، قدمت، کهنگی [م.ت]. |
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|
سُنْدُلَه |
[sondolE] |
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|
[پ ۱: ۴۱۸] |
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|
ساده لوح، احمق، کودن [م.ت]. |
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|
سِن خورْدَن |
[seN-xordæN] |
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|
[پ ۲: ۲۳۴] |
|
|
کهنه شدن، قدیمی شدن [م.ت]. |
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سوبو |
[subu] |
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|
[پ ۱: ۴۱۸] |
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|
کوزه [یزدی: ۱۶۶]/ ظرفی سفالین برای آب، بزرگتر از کوزه به شکل درخت سرو وارونه [گویش: ۱۱۵]/ سَبو [ح.م]. |
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سوبودون |
[subuduN] |
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[پ ۱: ۴۱۸] |
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|
سبودان، جایی که سبو در آن می گذارند [یزدی: ۱۶۶/ پ ۱: ۴۵۶/ گویش: ۱۱۵]. |
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سوزِ حِکَّه |
[su:z-e-hekkE] |
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[پ ۲: ۲۳۷] |
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|
درد و سوزش ناشی از سکسکه [م.ت]. |
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سولاخی |
[sulaxi] |
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[پ ۱: ۴۲۲] |
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سوراخی، گوشه گیر [یزدی: ۱۶۸/ پ ۱: ۴۵۶]/ آدمی که منزوی است و از حضور دیگران خجالت می کشد [گویش: ۱۱۶]. |
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سُویدَن |
[sowwidæN] |
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[پ ۱: ۴۴۳] |
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|
ساییدن، سوده شدن [م.ت]. |
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سِه گِرِنْج |
[segereŋ] [segereŋdZ] |
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[پ ۱: ۴۲۰] |
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ناحیه بین ابروها [یزدی: ۱۶۹/ پ ۱: ۴۵۶]/ وسط ابروها و به طور کلی همه اجزای صورت در مورد اخم کردن به کار می رود [گویش: ۱۱۴]/ کنایه از اخم و ابروهای در هم کشیده، چین و شکن ابرو [م.ت]. |
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سیا |
[sija] |
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[پ ۴: ۱۲۳] |
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سیاه [م.ت]. |
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سیبِ تُرْبَتی |
[si:b-e-torbEti] |
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[پ ۳: ۲۱۵] |
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سیب گلاب [یزدی: ۱۶۹]/ سیب کوچک سرخ و سفید [م.ت]. |
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سیبِ گَری |
[si:b-e-gEri] |
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[پ ۳: ۲۱۵] |
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سیب سبز رنگ کال و بی طعم و مزّه [م.ت]. |
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سیبُک |
[sibok] |
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[پ ۳: ۲۱۵] |
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سیب زمینی، حشفه آلت تناسلی مرد [یزدی: ۱۶۹]/ (سیب + ک تصغیر) سیب کوچک [م.ت]/ حنجره و سیب گلو [ح.م]. |
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سیفید |
[sifid] |
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[پ ۴: ۱۲۹] |
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سفید [گویش: ۱۱۸]. |
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سینَه کَفْتَری |
[sinE-kæftEri] |
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[پ ۴: ۱۲۳] |
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کنایه از کسی که سینه ای برجسته و زیبا داشته باشد [م.ت]. |
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