| ۱- |
ای آگه از خرابی و شُرب مدامِ ما |
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پُر کن مرا پیاله، که خالی ست جامِ ما |
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| ۲- |
مَستم کن آن چنان که شود خیره گوش و چشم |
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بر بانگِ ساز و رقصِ صنوبر خرامِ ما |
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| ۳- |
اُفتان ز فرط مستی و خیزان به پایِ خُم |
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این است پنج وعده قعود و قیامِ ما |
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| ۴- |
ما باده را نه کم نه به اندازه می خوریم |
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خوش داده اند دست به هم صبح و شامِ ما |
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| ۵- |
شیرین بُوَد همیشهِ ایّام کامِ آن |
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ماهی کَه مست بود و برآورد کامِ ما |
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| ۶- |
بوس از لبانِ ساقیِ گُلچِهر و دستِ شیخ |
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فرض و محال و هست حلال و حرامِ ما |
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| ۷- |
ما دوستی کنیم و محبّت به دشمنان |
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گر دُشمنی، ز کینه نکرد اِحترام ما |
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| ۸- |
آزاده را شماتت و آزار رسم نیست |
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این است رسم و عادت و مَشی و مرامِ ما |
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| ۹- |
هرگز نمی کُشیم و به خِفَّت نمی کَشیم |
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صید ار نشد شکار و نگردید رامِ ما |
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| ۱۰- |
در دفتری «جلالی» و بر روی سنگِ گور |
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جز این دو، بعدِ مرگ نبیند نام ما |
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