| ۱- |
نگاه، گاه بر آن قدِّ سروِ موزونست |
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گهی به نرگسِ مست و به لعلِ میگونست |
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| ۲- |
زِدور، دیدهِ درویشِ ما بُوَد خرسند |
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ز فیضِ دیدن و از بختِ خویش ممنونست |
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| ۳- |
ز دست داده دلانی که گیج و محرومند |
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گمان برند مُقَصِّر، سپهرِ گردونست |
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| ۴- |
گمان برند ندانند صاحبان جمال |
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که حال و روزِ پریشانِ عاشقان چونست |
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| ۵- |
منم کسی که برایِ کتابیِ بغلم |
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هزینه ام ز حساب و کتاب بیرونست |
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| ۶- |
به من که مستم و خاموش، عاقلان گویند |
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که حالِ مست، چو دیوانگان دگرگونست |
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| ۷- |
مرا به حالِ دلِ خویش واگذار ای دوست |
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ز وعظِ واعظِ بی مُتَعِظ دلم خونست |
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| ۸- |
به اوجِ عقل رسیده ست مستِ رندِ خموش |
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کسی که عاقلِ پُر مُدّعاست مجنونست |
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| ۹- |
نَه در خیالِ کلامِ سلیس و ذکرِ بلیغ |
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مدام ذهنِ «جلالی» به فکرِ مضمونست |
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