| ۱- |
یک شب کُنی از دَر بَرَم ای دوست اقامت |
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ممنون شوم از لطفِ تو تا روز قیامت |
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| ۲- |
ای سروِ خرامان، به قدوم تو کند خَم |
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در باغ صنوبر به تواضع قد و قامت |
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| ۳- |
گر مُشک گذارش به سر زلفِ تو افتد |
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رنگش پرد از چهره و بویش ز ندامت |
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| ۴- |
شاید که کند زنده، مسیحا نفسی باز |
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صد همچو منی کُشته ات از روی کرامت |
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| ۵- |
یا آن که دهد حکم که هر کشته بگیرد |
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یک بوسه ز دستِ تو به عنوان غرامت |
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| ۶- |
صد شکر ز عشقِ تو، شماتت نشنیدیم |
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تمجید نمودند و نکردند ملامت |
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| ۷- |
داغِ غمِ هجرانِ تو ما را به جَبین است |
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عالی تر از این نیست در این شهر علامت |
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| ۸- |
پیوسته به سیر و سفری این چه سفر بود |
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باز آی که آید به تنم باز، سلامت |
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| ۹- |
سر لوحهِ اشعار بود شعرِ تو حافظ |
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سرمشقِ «جلالی» شده پیوسته کلامت |
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