| ۱- |
برای خاطرِ جبران سال ها ستمت |
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شبی بیا به سراغم، فدایِ آن قدمت |
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| ۲- |
فرست نامه برایم اگر نمی آیی |
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که تا دو دیده بیفتد به رشحهِ قلمت |
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| ۳- |
مگر مفادِ زبانیِ نامه ات ببرد |
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ز چهره رنگ ملالت ز سینه زنگ غمت |
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| ۴- |
نبوده است و نداری و می خورم حسرت |
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که کاش شاملِ ما بود لُطفِ بیش و کَمَت |
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| ۵- |
کرامت از تو ندیده ست چشم و باشد باز |
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ز فرطِ شوق به امّید واهی کَرَمَت |
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| ۶- |
تو ای دو زلفِ چو خطِّ شکسته نستعلیق |
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دلم به تاب و تب افتد ز فرط پیچ و خَمَت |
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| ۷- |
دلم گرفته، ملولم کجایی ای مُطرِب |
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فدایِ نغمه ی جانسوز و بانگِ زیر و بَمَت |
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| ۸- |
تو هم ز حنجره، آوازه خوان، برآر آواز |
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بخوان سرودِ رهایی که گرم باد دَمَت |
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| ۹- |
غزل مگوی «جلالی» به عشقِ آنکه به دهر |
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برابر است برایش وجود یا عَدَمَت |
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