| ۱- |
ندانم کیست؟ چِبوَد خویِ فرّخ |
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که حافظ کرده وصفِ رویِ فرّخ |
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| ۲- |
به این نامست سرداری و باشد |
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غلامی و، مُجَعَّد موی فرّخ |
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| ۳- |
بوَد سردار و حافظ رفته گاهی |
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برای دیدنش تا کوی فرّخ |
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| ۴- |
ز زیبایی در او بوده ست چیزی |
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که شاعر راست میلی سوی فرّخ |
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| ۵- |
دهد آن رندِ بی مانند شرحی |
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ز زلف و از قد دلجوی فرّخ |
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| ۶- |
چنین گوید که زلفان سیاهش |
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موازی بوده تا زانوی فرّخ |
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| ۷- |
شگفتا پُشتِ شاعر از غم او |
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کمانی گشته چون ابروی فرّخ |
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| ۸- |
ز ساقی باده خواهد تا بنوشد |
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«به یاد نرگس جادوی فرّخ» |
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| ۹- |
الهی دست حافظ مانده باشد |
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«جلالی» حلقه در بازوی فرّخ |
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