| ۱- |
مرا به تازگی ای ساقی، این سخن باشد |
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بیار باده اگر باده کهن باشد |
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| ۲- |
بیار باده گلرنگ و سفره رنگین کن |
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به شرطِ آنکه لبِ جوی و در چمن باشد |
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| ۳- |
فریب خوردهِ این دلبرِ گلندامم |
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که آبگینه تن و سیمگون بدن باشد |
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| ۴- |
مده فریب من ای حوریِ جمیل سرشت |
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به قول و وعده، که این کار اَهرِمَن باشد |
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| ۵- |
شود چو خیره، سیاهی رود ز مردم چشم |
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که محو آن سر زلف شکن شکن باشد |
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| ۶- |
برم دو دست میان و کشانمش به کنار |
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اگر نشیند و جایش کنار من باشد |
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| ۷- |
«جلالی» ای سر و جانم فدای آن دهنی |
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که بازگو کنِ گرمیِ آن دهن باشد |
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