| ۱- |
مگو ساقی که می دیگر نباشد |
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خم می باشد ار ساغر نباشد |
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| ۲- |
بِبَر ما را کنارِ خم به سرداب |
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مرا جایی از آن خوش تر نباشد |
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| ۳- |
اگر پایم رسد آن جا نهم سر |
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به پای خم، کَز آن بهتر نباشد |
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| ۴- |
شرابِ ناب آن باشد که شُربَش |
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فراهم سازِ دردِ سر نباشد |
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| ۵- |
بده ساقی زلالی را که نورش |
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ز مِهرِ خاوران کمتر نباشد |
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| ۶- |
چنین می گفت: مستی، می حرامَست |
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اگر در بر تو را دلبر نباشد |
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| ۷- |
جوابش داد مخموری که گر بود |
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نیازِ من به می دیگر نباشد |
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| ۸- |
سرودی، نو نواز و دلپذیر است |
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که شعرِ کهنهِ دفتر نباشد |
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| ۹- |
به گوش خلق جانکاهست هرگاه |
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به مضمون، شاد و جان پرور نباشد |
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| ۱۰- |
سخن ور گر مقلِّد بود هرگز |
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سخنگوی سخن گستر نباشد |
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| ۱۱- |
«جلالی» را درون مِجمَرِ دل |
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به جز یک مشتِ خاکستر نباشد |
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