| ۱- |
دلم خوشست و به بانگ حجاز می گویم |
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که باز عازم خاک حجاز و آن کویم |
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| ۲- |
در آن حرم که ملایک به سجده سر سایند |
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بر آن سرم که نهم روی و آبرو جویم |
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| ۳- |
ندانم آن خم چوگان زلف و ابروی دوست |
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چه کرد، با دل سر در هوای چون گویم |
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| ۴- |
مباد آن که در آن بارگاه عزّ و جلال |
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غبار چهره به اشک بصر فرو شویم |
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| ۵- |
غبار کوی نبی، توتیای مردم ماست |
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مبار اشک و مریز آبرویم از رویم |
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| ۶- |
ز درگهت من بی چاره گر شوم نومید |
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کجا روم، چکنم «چاره از کجا جویم» |
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| ۷- |
مگر تو بازگشایی ز کار من گرهی |
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که من خود این نتوانم، به زور بازویم |
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| ۸- |
مرا تَف عطش بوسه بر مزارت کُشت |
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که در کنار تو لب تشنه بر لب جویم |
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| ۹- |
غلام تست «جلالی» چنان که حافظ گفت: |
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«غلام دولت آن خاک عنبرین بویم» |
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