| ۱- |
یا رب آن عهد شکن را سوی ما باز رسان |
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آن سفر کرده من را به وطن باز رسان |
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| ۲- |
لب من بر لب پیمانه و دور از لب اوست |
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باز، بَر آن دو لب غنچه دهن باز رسان |
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| ۳- |
جان من بود که رفت از تن رنجورم و باز |
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رحم بر من کن و این جان به بدن باز رسان |
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| ۴- |
بهر آگاهیش ای باد صبا، پیغامی |
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دَهَمت، گیر و بدان عهدشکن باز رسان |
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| ۵- |
گویش ای سرو قد رفته ز گلزار، بیا |
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سایه ات بر سرم ای سایه فِکَن باز رسان |
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| ۶- |
تا مگر تازه شود بار دگر عهدِ قدیم |
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دعوتی باز بدان یارِ کهن باز رسان |
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| ۷- |
این همان قول «جلالی» ست که حافظ فرمود: |
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«یا رب این آهوی مُشکین به چمن باز رسان» |
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