| ۱- |
ای چشم، با تواَم سخنی هست گوش کن |
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ترک نگاه مردم پشمینه پوش کن |
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| ۲- |
قومی نکرده کارتر از خرقه پوش نیست |
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اعراض از او و طایفه دُردنوش کن |
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| ۳- |
ای سر، اگر ز شارع میخانه بگذری |
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باری وداع یکسره با عقل و هوش کن |
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| ۴- |
ساقی تو را مجال تعقّل نمی دهد |
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گوید به گوش زمزمه می فروش کن |
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| ۵- |
ای دل تو نیز این همه آتش به جان مباش |
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با آبِ صبر، نارِ درون را خموش کن |
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| ۶- |
در سینه، حبس ناله، درآرد ز پا تو را |
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در جای آه، نعره برآور، خروش کن |
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| ۷- |
باری میسّر ار نشود آن چه شرح شد |
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لَج کرده رو به میکده و باده نوش کن |
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| ۸- |
هر بامداد بهر صبوحی ز جای خیز |
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نوش آن شراب مانده زِ زَقّوم دوش کن |
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| ۹- |
آنگه که عقل و هوش «جلالی» ز دست رفت |
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او را مرید طایفه خرقه پوش کن |
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