| ۱- |
ساقی ز راه لطف و عنایت به ما بگو |
|
باشد چه وقت نوبت ما، ساقیا بگو |
|
|
| ۲- |
خاموش و در ردیف به نوبت نشسته ایم |
|
با خیلِ خامُشان سخنی جانفزا بگو |
|
|
| ۳- |
از دست یار سنگ دل بی وفای خویش |
|
این جا نشسته ایم به آن بی وفا بگو: |
|
|
| ۴- |
از ما جسارتی و خلاف نزاکتی |
|
گردیده ای علانیه با ما بیا بگو |
|
|
| ۵- |
ای دل تو نیز تا همه خلق بشنوند |
|
هر بامداد شکوه خود با صبا بگو |
|
|
| ۶- |
خواهی اگر سریع تر از این رسد تو با |
|
دست و زبان مددکن و بنویس یا بگو: |
|
|
| ۷- |
با ما سخن ز جور و جفا گفته ای زیاد |
|
یک بار هم بیا و ز مِهر و وفا بگو |
|
|
| ۸- |
دلگیر گشته ایم از آن چین ابروان |
|
بگشا گره، کلام خوش و دلگشا بگو |
|
|
| ۹- |
در پیش روی ما مکن این قدر رو تُرُش |
|
خواهی اگر گلایه کنی در قفا بگو |
|
|
| ۱۰- |
هر چند ما به فحش سزاوار نیستیم |
|
یک بوسه ای به ما ده و صد ناسزا بگو |
|
|
| ۱۱- |
بگذار این گلایه «جلالی» و بعد از این |
|
«با یار آشنا سخن آشنا بگو» |
|
|
|
 |